बुधवार, १४ अक्तूबर २००९
टूट पायेंगे नहीं पत्थर ज़रा सी चोट से .........( गीत )
ये उड़ाने ही पड़ेंगे, भूमिगत विस्फोट से !!
जो ' विचारों ' का मसीहा था 'बिचारा ' हो गया है !
जिसको होना था भँवर ,वो ही किनारा हो गया है !
हम धरा को कोसते हैं, अंकुरण देती नहीं ,
क्यों नहीं कहते कि ये बादल नकारा हो गया है !
यदि ज़मीं को खोदकर पानी निकालोगे नहीं ,
छीन लेगा तो ये शबनम भी तुम्हारे होठ से !!
ये उड़ाने ही ..........................................
है महाभारत मगर अब कृष्ण भी खाली नहीं है !
और अब गाण्डीव में भी बात कल वाली नहीं है !
द्रौपदी ने केश तो खोले हैं पर सहमी हुई है ,
भीम में आक्रोश तो है किंतु बलशाली नहीं है !
भीष्म भी अन्याय का ही साथ देने तुल गए, तब
सामने करलो शिखण्डी , बाण मारो ओट से !!
ये उड़ाने ही ...........................................
शनिवार, १२ सितम्बर २००९
है बिलाशक ये दरिया चमन के लिए .....( ग़ज़ल )
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बदमिज़ाजी न बादल की सह पाऊंगा !
मुझको मंज़ूर है प्यास मन के लिए !!
वो तगाफुल नहीं मुझसे कर पाएंगे !
चाहिए आहुती भी हवन के लिए !!
याद रखता है इतिहास केवल उन्हैं !
जो कफन ओढ़ पाते हैं फ़न के लिए !!
हम भरे जा रहे पृष्ठ पर पृष्ठ हैं !
ढाई आखर बहुत थे सृजन के लिये !!
घर जला है तो फ़िर कुछ जला ही नहीं !
' पर ' जलाए हैं हमने गगन के लिए !!
लाख सर हों तुम्हारे चरण पर मगर !
चाहिए एक कांधा थकन के लिए !!
सर उठाना तुम्हारा बहुत खूब पर !
एक देहरी तो रख्खो नमन के लिए !!
( तगाफुल --उपेक्षा,उदासीनता )
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बुधवार, १५ जुलाई २००९
ढोते ढोते उजले चेहरे .....( ग़ज़ल )
ढोते ढोते उजले चेहरे, हमने काटी बहुत उमर !
अब तो एक गुनाह करेंगे ,पछता लेंगे जीवन भर !!
वो रेशम से पश्मों वाला, था तो सचमुच जादूगर !
मोर पंख से काट ले गया , वो मेरे लोहे के पर !!
उसको अगर देखना हो तो , आंखों से कुछ दूर रखो !
कुछ भी नहीं दिखाई देगा , आंखों में पड़ गया अगर !!
प्यास तुम्हारी तो पोखर के , पानी से ही बुझ जाती !
किसने कहा तुम्हें चलने को ,ये पनघट की कठिन डगर !!
ज्ञान कमाया जो रट रट कर , पुण्य कमाए जो डरकर !
उसकी एक हँसी के आगे ,वे सबके सब न्यौछावर !!
सिर्फ़ बहाने खोज रहा है , पर्वत से टकराने के !
बादल भरा हुआ बैठा है , हो जाने को झर झर झर !!
और भटकने दो मरुथल में , और चटखने दो तालू !
गहरी तृप्ति तभी तो होगी , गहरी होगी प्यास अगर !!
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रविवार, १४ जून २००९
वहीं तक पाँव हैं मेरे .......( ग़ज़ल )
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वहीं तक पाँव हैं मेरे ,जहाँ तक है दरी मेरी !
इसी में सब समेटा है ,यही जादूगरी मेरी !!
हमें निस्बत गुलाबों से , वो है गुलकंद का हामी !
बचेगी पाँखुरी कैसे ,किताबों में धरी मेरी ?
खरी तो सुन नहीं सकते ,किताबों से दबे चहरे !
यहाँ पर काम आजाएगी ,शायद मसखरी मेरी !!
निशाना जो तेरा बेहतर ,नहीं कम मार अपनी भी !
तेरा खंज़र बजेगा और ,बजेगी खंज़री मेरी !!
ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!
तुम्हें फ़िर हो न हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी !!
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शनिवार, ९ मई २००९
खूब पता था वो सागर है खारा पानी है ......( गीत )
गीत
खूब पता था वो सागर है खारा पानी है !
फिर भी प्यास बुझाने पहुंचे ये हैरानी है !!
बहुत दूर तक सन्नाटों ने राह नहीं छोड़ी
लेकिन हमने मीठे सुर की चाह नहीं छोड़ी
उधर नियति की और इधर अपनी मनमानी है .............
जीवन भर अपनी शर्तों पर जिसको जीना है
मीरा या सुकरात हलाहल उसको पीना है
सर कटवाकर जीने की हठ हमने ठानी है ................
बहुत कसे तारों को थोड़ा ढीला होना था
ढीले तारों को थोड़ा ठसकीला होना था
सुर के साथ हमेशा हमने की नादानी है ..................
आसमान को छू लेने की आस लगाली है
हमने बैठे ठाले अपनी प्यास बढाली है
छाया को कद समझ लिया है उस पर ज्ञानी है ?..........
अँजुरी भर अनुराग मिला तो आँगन सजा लिया
चुटकी भर वैराग मिला तो ओढा बिछा लिया
माया पूरी की पूरी तो हाथ न आनी है ...................
ना तो गोताखोर बने ,जल में गहरे उतरे
फ़िर भी सागर की बातें करने से नहीं डरे
अपने साथ सही, लेकिन यह बेईमानी है ...............
दौड़ रहे है लोग भला हम क्यों रह जांय खड़े ?
यही सोचकर, जाने कितने ,अंधे, दौड़ पड़े
फ़िर इसको विकास कहते है ,अज़ब कहानी है ............
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बुधवार, १ अप्रैल २००९
चितवन .........( गीत )
और मदिर हो गई चाँदनी घूंघट से छन छन !!
झरे मकरंद ,छंद, सिंगार ,
अलस ,मद,मान और मनुहार
हो गया चकाचौंध दरपन !
तुम्हारी .................
चुभी तो नयन नीर भर गई
झुकी तो पीर पीर कर गई
उठी तो तार तार था मन
तुम्हारी ................
सजीली ज्यों काशी की भोर
हठीली हुई बनी चित्तौर
और गीली तो बृन्दावन
तुम्हारी ..................
लजीली हुई बनीं निर्झर
पनीली तो अथाह सागर
और सपनीली तो मधुवन
तुम्हारी ...................
हुआ क्या मुझे पहुँच मझधार ,
कि लगने लगी बोझ पतवार
भँवर में इतना आकर्षण ?
तुम्हारी ..................
कभी झिलमिल ,झिलमिल ,झिलमिल
कभी खिलखिल, खिलखिल, खिलखिल
कभी फ़िर छूम ,छनन ,छन छन
तुम्हारी .......................
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सोमवार, २ फरवरी २००९
कैसौ आयौ नवल बसंत .....(. गीत - रसिया )
कैसौ आयौ नवल बसंत सखी री मोरे आंगन में !
पोर पोर में आस , प्यास भर गयौ उसाँसन में !!
धरा नें ऐसौ करौ सिंगार !
चुनर सतरंगी , पचलड़ हार !
रसीले नैनन में कचनार !
अंग अंग अभिसार झरै, ठसकौरी दुलहन में ....
कैसौ आयौ ..............
उडे गालन पै लाल अबीर !
हो गई पायलिया मंजीर !
छनकती फिरै जमुन के तीर !
सखि मुंडेर पै कागा बोलै, कोयलिया मन में .
कैसो आयौ...............
चटख रह्यौ कली कली कौ अंग !
फली की देह भई मिरदंग !
नवल तन हूक और हुरदंग !
पिया संदेसौ पढे ननदिया काजर कोरन में ....
कैसो आयौ............
चढौ ऐसो टेसू कौ रंग !
जोगिया बन गए पिया मलंग !
बिलम गई फाग आग के संग !
मैं वासंती चुनर निहारत रह गई दरपन में ....
कैसो आयौ ..........
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सोमवार, २२ दिसम्बर २००८
ये क्या हो गया.........? (ग़ज़ल)
मंगलवार, १६ दिसम्बर २००८
उपालंभ ( उलाहना )............गीत
यह गीत उस उम्र का है जब किसी की राई जैसी उपेक्षा भी पर्वत से बड़ी महसूस होती है !विदा के क्षणों में आँखों का न डबडबाना भी फांस बनकर आंसने लगता है ! कच्चेपन का पक्का गीत .......
यदि तेरे नत नयनों में भर आता नीर नमन का !
तो इतना एहसास न होता एकाकी जीवन का !!
अचक अचानक टूट गए क्यों अमर नेह के नाते
छोड़ गए क्यों गीत अधूरे अधरों पर लहराते
सागर की अनंत गहरे पर अभिमान न करते
लग जाता अनुमान कहीं यदि लहरों की थिरकन का !
तो इतना एहसास..........
देखी थी अव्यक्त वेदना पायल की रुनझुन में
सौ सौ नमन प्रीत के देखे थे प्यासी चितवन में
यदि प्रणाम तक ही सीमित रह जाती अंजलि मेरी
तो मन्दिर उपहास न करता पाषाणी पूजन का !
तो इतना एहसास ...........
कब अभीष्ट थी अरुण कपोलों पर वसंत की लाली ?
कब इच्छित थी मादक नयनों से छलकी मधु प्याली ?
सौरभमय केसर क्यारी की भी तो चाह नहीं थी ,
एक सुमन ही काफ़ी था इस मन को अभिनन्दन का !
तो इतना एहसास ...............
कब कब बता शलभ ने जल कर दोष दिया बाती को ?
मृग ने बता कभी कोसा है कस्तूरी थाती को ?
उपालंभ अब हम ही क्या जा उन्हें सुनाएँ जिनको ,
आकृति का विक्रतावर्तन भी लगा दोष दर्पण का !
तो इतना एहसास ..............
सोमवार, २० अक्तूबर २००८
औरत ( ग़ज़ल )
तभी से आदमी ने बाँध की साजिश रची होगी !!
तुझे देवी बनाया और पत्थर कर दिया तुझको !
तरेगी भी अहिल्या तो चरण रज राम की होगी !!
मरुस्थल में तुम्हारा हाल तो उस बूँद जैसा है !
जिसे गुल पी गए होंगे जो काँटों से बची होगी !!
कहीं पर निर्वसन है और निर्वासन कहीं पर है !
नहीं कुछ फर्क है, तू द्रोपदी या जानकी होगी !!
धुएँ को देखनेवालो ,ज़रा सा गौर से देखो !
यहीं पर आँच भी होगी , यहीं थोड़ी नमी होगी !!
तुम्हारी शख्सियत अंधों का हाथी ही रही हरदम !
मिठासों की कहानी है जो गूंगे ने कही होगी !!
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